राम नरेश ठाकुर
दरभंगा जिले के महिनाम गांव में ब्राह्मण समाज के एक कार्यक्रम के दौरान प्रशांत किशोर ने शिक्षा, सामाजिक जिम्मेदारी और चुनावी राजनीति को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण समाज की ऐतिहासिक पहचान ज्ञान, पढ़ाई और संस्कार से जुड़ी रही है, लेकिन अब समाज को अपनी उस विरासत पर फिर से ध्यान देने की जरूरत है। अपने संबोधन में उन्होंने मुस्लिम समुदाय के खिलाफ सोशल मीडिया पर की जाने वाली टिप्पणियों को भी राजनीतिक और सामाजिक रूप से नुकसानदायक बताया।
प्रशांत किशोर ने कहा कि किसी समाज की प्रतिष्ठा केवल उसकी संख्या, धन या बाहुबल से तय नहीं होती। उनके मुताबिक, ब्राह्मण समाज को अतीत में सम्मान इसलिए मिला क्योंकि उसके पूर्वजों ने शिक्षा को महत्व दिया और सीमित संसाधनों के बावजूद बच्चों को पढ़ाने पर जोर रखा। उन्होंने इसे समाज की सबसे अहम विरासतों में से एक बताते हुए कहा कि आज इस परंपरा को आगे बढ़ाने की जरूरत है।
शिक्षा और संस्कार को बताया समाज की ताकत
अपने भाषण में प्रशांत किशोर ने ब्राह्मण समाज के पुराने सामाजिक संस्कारों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पहले अपने परिवार का पेट भरने के बाद दूसरों की भूख की चिंता करना भी सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा माना जाता था। उनके अनुसार, अब समाज का ध्यान साझा जिम्मेदारियों से हटकर इस सवाल पर अधिक केंद्रित हो गया है कि “हमें क्या मिलेगा?”
उन्होंने कहा कि ज्ञान और शिक्षा की परंपरा को केवल बीते समय की बात बनाकर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। समाज को अपने बच्चों की पढ़ाई, सार्वजनिक जीवन में भागीदारी और जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशीलता पर ध्यान देना चाहिए। प्रशांत किशोर ने इस बात पर भी जोर दिया कि अपनी पहचान का दावा करने के साथ-साथ उससे जुड़ी जिम्मेदारियों को निभाना जरूरी है।
मुस्लिम मतदाताओं से दूरी पर उठाए सवाल
प्रशांत किशोर ने अपने संबोधन में मुस्लिम मतदाताओं और ब्राह्मण समाज के पुराने राजनीतिक रिश्तों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि एक समय मुस्लिम समुदाय का एक हिस्सा ब्राह्मणों को समर्थन देता था और उन्हें “गुरुजी” कहकर संबोधित करता था। उनके मुताबिक, समय के साथ यह समर्थन कम हुआ और दोनों समुदायों के बीच दूरी बढ़ी।
उन्होंने इस बदलाव के पीछे सामाजिक व्यवहार और राजनीतिक रुख को भी एक वजह बताया। भाषण में उन्होंने कहा कि यदि कोई समुदाय सोशल मीडिया पर मुसलमानों को गाली देता है, तो इससे पुराने संबंध और भरोसा कमजोर हो सकते हैं। उन्होंने सवाल किया कि जब जमीन या आरक्षण को लेकर सीधा विवाद नहीं है, तो फिर मुस्लिम समुदाय के प्रति नाराजगी किस बात की है।
प्रशांत किशोर ने यह भी कहा कि चुनाव में किसी समाज को समर्थन चाहिए, तो उसे दूसरे समुदायों से संवाद बनाए रखना होगा। उन्होंने अपने भाषण में भाजपा का झंडा उठाने के बाद मुस्लिम मतदाताओं के एक वर्ग के दूर जाने का दावा किया। यह उनका राजनीतिक आकलन था, जिसे उन्होंने सभा में मौजूद लोगों के सामने रखा।
‘जिस समाज को साथ बिठाया, उससे दूरी क्यों?’
अति पिछड़ा समाज की राजनीतिक भूमिका पर बात करते हुए प्रशांत किशोर ने कहा कि इस वर्ग की अहमियत बिहार की राजनीति में लगातार बनी हुई है। उन्होंने कहा कि उनके पूर्वजों ने अलग-अलग सामाजिक समूहों को साथ बैठाने की कोशिश की थी। ऐसे में आज पुराने सामाजिक संबंधों को कमजोर करना उचित नहीं है।
उन्होंने ब्राह्मण समाज से अपील की कि वह अपने प्रभाव और पहचान को केवल चुनावी गणित तक सीमित न रखे। उनके मुताबिक, अगर किसी समुदाय को समाज में सम्मान और राजनीतिक समर्थन दोनों चाहिए, तो उसे संवाद, शिक्षा और आपसी सहयोग के रास्ते पर चलना होगा।
परशुराम और ‘कलम-किताब’ की बात
ब्राह्मण समाज को परशुराम से जोड़ने वाली पहचान पर टिप्पणी करते हुए प्रशांत किशोर ने कहा कि समाज को गलत रास्ता नहीं चुनना चाहिए। उन्होंने ब्राह्मणों की ताकत को कलम और किताब से जोड़ते हुए कहा कि ज्ञान और शिक्षा ही उनकी प्रमुख पहचान होनी चाहिए। उन्होंने फरसा चलाने को ब्राह्मण समाज का काम बताने वाली सोच से असहमति जताई।
प्रशांत किशोर का पूरा संबोधन इस बात पर केंद्रित रहा कि सामाजिक प्रतिष्ठा केवल अतीत के गौरव से नहीं, बल्कि वर्तमान के व्यवहार से भी बनती है। उन्होंने शिक्षा, संस्कार और दूसरे समुदायों के प्रति सम्मान को समाज की आगे बढ़ने की जरूरी शर्त बताया। साथ ही, सोशल मीडिया पर अपमानजनक भाषा से बचने और पुराने सामाजिक रिश्तों को समझने की अपील की।
दरभंगा के महिनाम गांव में दिया गया यह भाषण ऐसे समय में आया है, जब बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण और विभिन्न समुदायों का समर्थन चुनावी चर्चा के केंद्र में रहता है। प्रशांत किशोर ने अपने वक्तव्य में ब्राह्मण समाज से विरासत, शिक्षा और सामाजिक संवाद को फिर से प्राथमिकता देने का आग्रह किया।


