
राम नरेश ठाकुर
उत्तर प्रदेश की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां अभी से तेज हो गई हैं और इसी बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक ऐसा ऐलान कर दिया है, जो सूबे की सियासत में चर्चा का बड़ा विषय बन गया है। सपा प्रमुख ने साफ शब्दों में कह दिया है कि वे अगले विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। उनका तर्क है कि जब वे चुनाव नहीं लड़ते, तब ही मुख्यमंत्री बनते हैं। यानी 2012 वाला वही फॉर्मूला, जब वे लोकसभा सांसद रहते हुए सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी पहुंचे थे।
यह फैसला सिर्फ एक बयान भर नहीं है, बल्कि इसके पीछे यूपी की राजनीति का एक लंबा इतिहास और सुपरिकल्पित रणनीति छिपी है। आइए समझते हैं कि अखिलेश यादव का यह रुख कितना अहम है और उत्तर प्रदेश में बिना विधानसभा चुनाव लड़े मुख्यमंत्री बनने वाले नेताओं की फेहरिस्त में कौन-कौन शामिल है।
अखिलेश यादव का बड़ा ऐलान
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने बयान में कहा कि वे उसी वक्त मुख्यमंत्री बनते हैं, जब चुनाव नहीं लड़ते। पिछली बार भी वे लोकसभा सांसद रहते हुए मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने पहुंचे थे और इस बार भी वे सीधे वहीं से आकर शपथ लेंगे। इस बयान से सियासी गलियारों में तस्वीर लगभग साफ हो गई है कि अखिलेश यादव यूपी विधानसभा चुनाव 2027 में किसी सीट से मैदान नहीं उतरेंगे।
2012 के विधानसभा चुनाव में भी ऐसा ही हुआ था। उस वक्त समाजवादी पार्टी ने प्रचंड बहुमत हासिल किया था। अखिलेश यादव उस समय कन्नौज से लोकसभा सांसद थे। पार्टी ने युवा चेहरे के रूप में उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी दी और उन्होंने बिना विधायक बने ही शपथ ली। बाद में लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा देकर वे विधान परिषद (MLC) के रास्ते विधानमंडल में शामिल हुए थे।
चुनाव न लड़ने के फैसले के पीछे क्या है रणनीति?
अखिलेश यादव का यह निर्णय भावुकता नहीं, बल्कि गणित और भूगोल का खेल है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इसके पीछे तीन बड़ी वजहें मानी जा रही हैं। जब कोई नेता किसी एक विधानसभा सीट से चुनाव लड़ता है, तो उसकी ऊर्जा, समय और संसाधन उसी क्षेत्र में केंद्रित हो जाते हैं। सीट न लड़ने का फायदा यह है कि अखिलेश यादव एक-एक जिले, एक-एक मंडल का दौरा कर समाजवादी पार्टी और ‘पीडीए’ यानी पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक गठबंधन के पक्ष में पूरे प्रदेश में माहौल बना सकेंगे।
सपा प्रमुख का मानना है कि व्यक्तिगत रूप से चुनाव जीतने से कहीं ज्यादा जरूरी अपनी पार्टी को सत्ता की दहलीज तक पहुंचाना है। अगर सपा और उसके सहयोगियों को बहुमत मिल गया, तो मुख्यमंत्री पद तो उन्हें मिलना ही है। सदस्यता का रास्ता बाद में निकल आएगा — या तो विधान परिषद से या फिर उपचुनाव के जरिए।
अखिलेश यादव ने संकेत दिया है कि वे वही काम करेंगे, जो उनके लिए ‘शुभ’ रहा हो। 2012 में बिना चुनाव लड़े सीएम बनना उनके लिए भाग्यशाली साबित हुआ था। सियासत में ज्योतिष और मुहूर्त की मान्यताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जाता, और सपा प्रमुख इस बार भी उसी ‘शुभ’ रास्ते पर चलना चाहते हैं।
यूपी का इतिहास: बिना चुनाव लड़े मुख्यमंत्री बनने वाले दिग्गज नेता
जो लोग सोच रहे हैं कि बिना चुनाव लड़े सीएम बनना असाधारण बात है, उनके लिए जानना जरूरी है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह रास्ता बार-बार इस्तेमाल होता रहा है। 2007 से 2017 तक के एक दशक में तो लगभग हर मुख्यमंत्री विधान परिषद या उपचुनाव के रास्ते ही राजभवन पहुंचे। आइए देखते हैं उन दिग्गजों की पूरी फेहरिस्त, जिन्होंने शपथ लेते समय विधानसभा के सदस्य नहीं थे।
त्रिभुवन नारायण सिंह: पहले ऐसे सीएम, जिन्होंने उपचुनाव हारा
कांग्रेस के दिग्गज नेता त्रिभुवन नारायण सिंह यूपी के पहले ऐसे मुख्यमंत्री थे, जो शपथ लेते वक्त राज्य के किसी भी सदन — न विधानसभा, न विधान परिषद — के सदस्य नहीं थे। 18 अक्टूबर 1970 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली। संवैधानिक अनिवार्यता पूरी करने के लिए उन्हें छह महीने के भीतर किसी सदन की सदस्यता हासिल करनी जरूरी थी। इसके लिए उन्होंने गोरखपुर की मानीराम विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ा, लेकिन कांग्रेस (आर) के रामकृष्ण द्विवेदी के हाथों हार गए। नतीजा यह हुआ कि उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। यह घटनाक्रम बताता है कि संवैधानिक रास्ता कितना सख्त है — बिना सदस्यता के सीएम की कुर्सी छह महीने से ज्यादा नहीं टिक सकती।
राम प्रकाश गुप्ता: राजनीतिक संन्यास से सीधे सीएम की कुर्सी तक
नवंबर 1999 में भाजपा ने कल्याण सिंह को हटाकर राम प्रकाश गुप्ता को सूबे की सत्ता सौंपी। दिलचस्प बात यह थी कि उस वक्त गुप्ता सक्रिय राजनीति से लगभग दूर थे और राज्य के किसी सदन के सदस्य नहीं थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने विधान परिषद का रास्ता चुना और एमएलसी बनकर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी की। राम प्रकाश गुप्ता का कार्यकाल हालांकि ज्यादा लंबा नहीं चल पाया और 2000 में राजनाथ सिंह ने उनकी जगह ली, लेकिन यह घटनाक्रम इसलिए अहम है क्योंकि यह दिखाता है कि पार्टी हाई कमान किसी भी चेहरे को संगठन से निकालकर सीधे सीएम बना सकती है।
राजनाथ सिंह: राज्यसभा सांसद से सीएम, फिर उपचुनाव में जीत
वर्तमान में देश के रक्षा मंत्री रहे राजनाथ सिंह ने अक्टूबर 2000 में पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उस वक्त वे केंद्र सरकार में भूतल परिवहन मंत्री और राज्यसभा सांसद थे। सीएम बनने के बाद उन्होंने बाराबंकी जिले की हैदरगढ़ विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ा। उन्होंने न सिर्फ यह चुनाव जीता, बल्कि विधायक के रूप में सदन में अपनी जगह पक्की की। राजनाथ सिंह का यह मॉडल बताता है कि उपचुनाव का रास्ता चुनने वाले नेता के लिए जीत कितनी जरूरी होती है, क्योंकि हार का मतलब सीधा इस्तीफा होता है — जैसा त्रिभुवन नारायण सिंह के साथ हुआ था।
मायावती: बिना चुनाव लड़े दो बार सीएम बनीं
बसपा प्रमुख मायावती इस लिस्ट की सबसे बड़ी मिसाल हैं, क्योंकि वे दो बार बिना विधानसभा चुनाव लड़े मुख्यमंत्री बनीं। पहली बार जून 1995 में गेस्ट हाउस कांड के बाद जब बीजेपी के समर्थन से उन्होंने पहली बार सत्ता संभाली, तब वे विधायक नहीं, बल्कि राज्यसभा सांसद थीं। हालांकि, वह सरकार केवल सवा चार महीने ही चल सकी।
दूसरी और सबसे सफल बार 2007 में आई, जब बसपा को उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत मिला। फिर भी मायावती ने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था था और वे राज्यसभा सांसद ही थीं। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने उपचुनाव लड़ने की जगह विधान परिषद (MLC) की सदस्यता ली और पूरे पांच साल एमएलसी के तौर पर सीएम की कुर्सी संभाली। यानी यूपी के इतिहास में विधान परिषद से मुख्यमंत्री रहने का सबसे लंबा और सबसे स्थिर दौर मायावती का रहा।
मुलायम सिंह यादव: सांसद रहते तीसरी बार सीएम, उपचुनाव में रिकॉर्ड जीत
समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव अगस्त 2003 में जब तीसरी बार यूपी के मुख्यमंत्री बने, तब वे संभल से लोकसभा सांसद थे। संवैधानिक बाध्यता पूरी करने के लिए उन्होंने बदायूं जिले की गुन्नौर विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ा और रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की। इसके बाद वे 2007 तक लगातार सूबे के मुख्यमंत्री रहे। नेताजी का यह दौर इसलिए खास है क्योंकि यह दिखाता है कि लोकसभा सांसद होते हुए भी सीएम बनने में कोई कानूनी रुकावट नहीं है — बस बाद में विधानमंडल की सदस्यता लेनी होती है।
अखिलेश यादव: 2012 में युवा चेहरा, बिना चुनाव लड़े सीएम
2012 का विधानसभा चुनाव सपा के लिए ऐतिहासिक रहा। पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला और पार्टी ने युवा चेहरे के रूप में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री चुना। शपथ ग्रहण के समय वे कन्नौज से लोकसभा सांसद थे। बाद में उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा देकर विधान परिषद के जरिए विधानमंडल की सदस्यता ली। पांच साल के इसी कार्यकाल में लैपटॉप वितरण, बेरोजगारी भत्ता जैसी योजनाओं ने उन्हें युवाओं का पसंदीदा नेता बना दिया। अब 2027 में वे ठीक उसी फॉर्मूले को दोहराना चाहते हैं।
योगी आदित्यनाथ: सांसद रहते सीएम, फिर विधायक भी बने
2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला। पार्टी ने गोरखपुर से पांच बार लोकसभा सांसद रहे योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया। शपथ ग्रहण के समय वे राज्य के किसी सदन के सदस्य नहीं थे। बाद में उन्होंने विधान परिषद (MLC) की सदस्यता ग्रहण की। हालांकि, 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने सीधे गोरखपुर शहर सीट से चुनाव लड़ा, विधायक बने और लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। इससे पहले 2007 में भी योगी आदित्यनाथ का नाम सीएम पद के दावेदारों में शामिल था, लेकिन तब वे लोकसभा छोड़ने को तैयार नहीं थे।
2027 की सियासी तस्वीर: पीडीए बनाम भाजपा की तैयारी
यूपी विधानसभा चुनाव 2027 में समाजवादी पार्टी की रणनीति ‘पीडीए’ यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण पर केंद्रित है। अखिलेश यादव का यह ऐलान इस बात का संकेत भी है कि वे अपने सहयोगी दलों को भरोसे में लेकर एक बड़ा गठबंधन खड़ा करना चाहते हैं। दूसरी ओर बीजेपी की तैयारियां भी तेज हैं — प्रदेश अध्यक्ष पद पर पूर्व सीएम केशव प्रसाद मौर्य की वापसी और संगठन का बड़ा विस्तार इसके इशारे माने जा रहे हैं।
इतिहास गवाह है कि उत्तर प्रदेश में सीएम की कुर्सी तक पहुंचने के लिए सीधे चुनाव मैदान में उतरना एकमात्र रास्ता नहीं रहा। 2007 से 2017 के बीच तो ज्यादातर मुख्यमंत्री विधान परिषद के रास्ते ही राजभवन पहुंचे। अब देखना दिलचस्प होगा कि अखिलेश यादव का 2012 वाला ‘शुभ’ फॉर्मूला 2027 में कितना भारी पड़ता है — सीएम योगी आदित्यनाथ के अनुभव पर या फिर सपा के युवा चेहरे की अपील पर।





