
राम नरेश ठाकुर
गंगा की धारा के साथ-साथ काशी में राजनीति भी बहती रही है, लेकिन इस शहर ने कभी-कभी उस धारा की दिशा भी बदली है। दिसंबर की उस दोपहर, जब जनता दल (यूनाइटेड) का राज्यस्तरीय कार्यकर्ता सम्मेलन यहां हुआ, मंच पर जो तस्वीर बनी, वह किसी खबर से ज्यादा एक संदेश थी। मुख्य पंक्ति में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे और पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष निशांत कुमार थे — और उनके भाषण का अर्थ बिहार की सीमा से आगे जाकर ही समझा जा सकता है। जेडीयू ने अगले ही दिन अपने राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद के जरिए जो बयान जारी किया कि पार्टी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रही है और NDA के घटक के रूप में मैदान में उतरेगी, वह इसी संदेश की आधिकारिक मुहर बन गया। सवाल यह है कि इस पूरे दांव में सबसे बड़ा दांव किसका है? जवाब बेझिझक दिया जा सकता है — निशांत कुमार का।
उत्तराधिकार की परियोजना: चार पड़ाव, एक दिशा
निशांत कुमार की सियासत को अगर ध्यान से देखें, तो वह किसी अचानक अनावरण की कहानी नहीं है। यह एक सोची-समझी, चरणबद्ध परियोजना है, जिसके अब तक चार पड़ाव तय हो चुके हैं।
पहला पड़ाव संगठन था। नीतीश कुमार ने अपने बेटे को पहले पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष की कुर्सी पर बिठाया — यानी सियासत के कक्षा-रूम में प्रवेश, जहां चुनावी दंगल से पहले संगठन की भाषा सीखी जाती है। दूसरा पड़ाव था जनता की कसौटी। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में हरनौत सीट से टिकट मिला, और निशांत ने करीब 39 हजार से अधिक मतों के अंतर से जीत दर्ज की। यह हाशिए से कम नहीं है, क्योंकि उत्तराधिकारियों की असली परीक्षा पार्टी के दरबार में नहीं, मतदाता के बूथ पर होती है। तीसरा पड़ाव आया नतीजों के बाद — बिहार सरकार में स्वास्थ्य मंत्रालय, यानी प्रशासनिक जिम्मेदारी का पहला स्वाद, वह भी उस विभाग की परिक्षा में जो नीतीश राज में हमेशा प्राथमिकता रहा है।
और अब चौथा पड़ाव — बिहार से बाहर का मंच। यही इस पूरी कथा का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ है। बिहार के भीतर तो निशांत की परीक्षा ‘नीतीश के बेटे’ होने की पूंजी से पास हो सकती थी, लेकिन उत्तर प्रदेश के मैदान में कोई भी नाम अपने बल पर खड़ा होना सीखता है। नीतीश कुमार अपने उत्तराधिकारी को ठीक उसी जगह ले जा रहे हैं, जहां उनकी अपनी पार्टी को सबसे ज्यादा जरूरत है — और जहां परिवार का नाम किसी काम का नहीं रहता।
काशी क्यों? भूगोल भी, इतिहास भी
सम्मेलन के लिए वाराणसी का चुनाव किसी सुविधा का नतीजा नहीं है। काशी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है — यानी जेडीयू ने अपने गठबंधन-साथी के सबसे मजबूत किले की सीमा पर खड़े होकर अपनी मंशा जाहिर की। यह बात दो तरह का संदेश देती है। ए, दिल्ली में बैठे बीजेपी नेतृत्व को यह संदेश कि हम यूपी में सक्रिय होने की सोच रखते हैं। बी, अपने कार्यकर्ताओं को यह संदेश कि हम प्रतीकात्मक हलचल नहीं, वास्तविक तैयारी चाहते हैं।
काशी का एक और रिश्ता भी है — नीतीश कुमार से। 2016-17 के बीच जब नीतीश ने बिहार की महागठबंधन की जीत के बाद अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा के नैरेटिव को हवा दी थी, तब भी उनकी पहली पसंद यही शहर थी। गांधीवादी संस्थाओं से शुरू हुई ‘जन संसद’, स्वच्छता के लिए पैदल यात्राएं, सामाजिक सरोकारों के मंच — सब काशी से निकले थे। 2017 के यूपी चुनाव में सीटों की मांग की खबरें भी तेज हुई थीं, लेकिन NDA में रहते हुए पार्टी ने कदम पीछे खींच लिया था। आठ साल बाद नीतीश की जगह उनके बेटे ने उसी शहर में खड़े होकर वही परियोजना फिर से शुरू की है — इससे सटीक प्रतीकात्मकता और क्या हो सकती है कि विरासत की परियोजना और पार्टी की विस्तार-परियोजना एक ही बिंदु पर मिल गईं।
‘ब्रांड नीतीश’ का विस्तार-अभियान और उसका वाहक
समझने वाली बात यह है कि जेडीयू की यूपी महत्वाकांक्षा निशांत कुमार के बिना अधूरी थी, और निशांत कुमार की राष्ट्रीय पहचान यूपी के बिना अधूरी रहने वाली है। दोनों जरूरतें एक-दूसरे की पूरक हैं।
बिहार के बाहर जेडीयू की पहचान किसी संगठन से नहीं, एक चेहरे से जुड़ी है — नीतीश कुमार से। सुशासन, विकास, महिला सशक्तिकरण, बिजली-सड़क-शिक्षा-स्वास्थ्य की बिहार-कहानी — यह पूरा नैरेटिव एक व्यक्ति की पहचान पर टिका है। राजनीति का लोहा गर्म रहे, तो इस ब्रांड का विस्तार संभव है; वक्त बीत गया, तो यह ब्रांड एक राज्य की सीमा में सिमटकर रह जाएगा। निशांत कुमार की भूमिका इसीलिए सिर्फ ‘नेता के बेटे’ की भूमिका नहीं है — वे ‘ब्रांड एम्बेसडर’ हैं, जिन्हें सुशासन की बिहार-कहानी को देश के सबसे बड़े बाजार में बेचना है।
उनका अपना भाषण भी इसी दिशा में तैयार था। उन्होंने जेडीयू को समाजवाद और समानता के सिद्धांतों पर चलने वाली पार्टी बताया और नीतीश के पिछले दो दशक के विकास-मॉडल को दूसरे राज्यों तक पहुंचाने की बात कही। ध्यान दें — उन्होंने सीटों या सत्ता की बात नहीं की, विचार की बात की। यह कोई संयोग नहीं। यूपी में जेडीयू को पहले एक विचारधारा के रूप में जगह बनानी होगी; सीट-बंटवारे की बातचीत उसके बाद की अवस्था है। निशांत की टीम स्पष्ट रूप से यही क्रम चाहती है — पहले नैरेटिव, फिर गणित।
यूपी का पुराना खाता: जमीन खाली, इरादा पक्का
यह कवायद आसान इसलिए भी नहीं है, क्योंकि जेडीयू का यूपी खाता कागज पर पुराना है, जमीन पर लगभग खाली। पार्टी की जड़ें समता पार्टी में जाती हैं, जिसका यूपी से वास्ता रहा है — 1996 की विधानसभा में उसकी एक सीट जीत थी और 1990 के दशक के अंत तक यह पार्टी राष्ट्रीय दल का दर्जा पा चुकी थी। 2000 में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का समता पार्टी से जुड़ना एक बड़ी घटना थी, जिसने लोध समुदाय समेत कई लोअर ओबीसी वर्गों का एक हिस्सा इस राजनीति से जोड़ा था। यानी जेडीयू का यूपी से ‘नाता’ मनगढ़ंत नहीं है।
लेकिन नाते और नेतृत्व में फर्क होता है। 2022 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू ने दो सीटों से परीक्षा ली और दोनों उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई। उससे पहले 2021 में जेडीयू-जेपी (जन अधिकार पार्टी) की गठबंधन घोषणा भी चर्चा बटोरती रही, पर नतीजे जमीन पर कुछ नहीं बदल पाए। 2024 के लोकसभा चुनाव में मिर्जापुर से खड़े उम्मीदवार को भी हार ही मिली। राजीव रंजन प्रसाद का यह दावा कि जेडीयू के उम्मीदवार विधानसभा तक पहुंच चुके हैं, इतिहास की किताब में सही लिखा है; वर्तमान की जमीन पर इसका कोई वजन नहीं है। और यही खाली जगह है, जिसे अब निशांत कुमार के नाम से भरने का अभियान शुरू हुआ है।
दिसंबर की संगठनात्मक चाल: नींव की ईंटें
सम्मेलन से पहले ही पार्टी ने दिसंबर 2025 की शुरुआत में यूपी का नया संगठन घोषित कर दिया था। संजय कुमार सिंह को प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया और चार उपाध्यक्षों, पांच महासचिवों व बड़ी संख्या में युवा पदाधिकारियों की टीम गठित की गई। ‘काशी विस्तार अभियान’ के नाम से 40 जिलाध्यक्ष और 396 विधानसभा अध्यक्ष नियुक्त करने की बात कही गई — यानी यूपी की लगभग हर विधानसभा सीट पर एक नामित चेहरा। रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि इनमें करीब 125 पदाधिकारी कुर्मी समुदाय से हैं।
यह आंकड़ा संयोग नहीं है, और यही इस पूरी तैयारी की असली रणनीतिक परत है। पूर्वी यूपी में कुर्मी वोट का रुझान अक्सर जीत-हार का फैसला करता है। नीतीश कुमार की पार्टी की पहचान ही मूल रूप से कुर्मी नेतृत्व की पार्टी के तौर पर बनी है, जबकि भाजपा ने 2017 और 2022 में अपने कुर्मी-मुखी चेहरों — केशव प्रसाद मौर्य समेत कई वर्षों तक — इसी वर्ग को अपने झंडे तले रखा है।
सियासी पर्यवेक्षकों का मानना है कि यूपी में भाजपा के लिए कुर्मी वोट के हिस्से खिसकने का खतरा हमेशा बना रहता है। जेडीयू की कोशिश इसी वर्ग को ‘अपना घर’ महसूस कराने की है, और निशांत कुमार की मौजूदगी इस संदेश को दोगुना प्रभावी बनाती है — क्योंकि वे उसी पारंपरिक आधार के नेतृत्व का जीता-जागता प्रतीक हैं। साथ ही सपा का पूर्वी यूपी में गहरा ओबीसी आधार भी इस गणित की एक परत है, जिसे जेडीयू काटने की सोच रहती है।
गठबंधन के भीतर का रास्ता — और उसकी कीमत
सबसे निर्णायक सवाल यह है कि जेडीयू यूपी में किस रूप में उतरेगी। राजीव रंजन प्रसाद के बयान ने इस सवाल का जवाब पहले ही दे दिया है: NDA के घटक दल के रूप में। उन्होंने यह भी साफ कहा कि पार्टी उन सीटों का आकलन कर रही है जहां से उसके उम्मीदवार बेहतर प्रदर्शन कर सकें, और NDA के साथ संभावनाओं पर ही विचार चल रहा है। यानी तीसरी ताकत बनने की बात अभी नहीं है; बात गठबंधन के भीतर अपना कमरा बनवाने की है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि पार्टी ने सीटों की कोई संख्या नहीं बताई — और यह खामोशी ही असली संकेत है कि बातचीत अभी मेज पर है, बोली अभी नहीं लगी।
इस रणनीति में एक स्पष्ट तर्क है। 2025 के बिहार नतीजों के बाद — जहां NDA ने 243 में से 202 सीटें जीतीं और जेडीयू अपनी 101 में से 85 जीतकर गठबंधन की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी — नीतीश कुमार का गठबंधन के भीतर वजन चरम पर है। ऐसे में बीजेपी के लिए पुराने साथी को यूपी में सम्मानजनक जगह देना संतुष्टि का सौदा भी हो सकता है। जेडीयू को भी मोदी फैक्टर और बीजेपी की मशीनरी की छतरी में चुनिंदा सीटों पर संयुक्त वोट का हिस्सा मिलने की संभावना दिखती है।
लेकिन इस रास्ते की कीमत भी साफ है। यूपी की भाजपा का अपना ओबीसी समीकरण गहरा है — कुर्मी, लोध, कश्यप समेत दर्जनों पिछड़ी जातियों के वजनदार नेता उसके तंबू में बैठे हैं। ‘साफ’ सीटें मिलना लगभग असंभव है, और जो सीटें भाजपा के लिए लुभावनी नहीं हैं, वहां भी अन्य साझेदारों के दावे पहले से दर्ज होते हैं। इससे बड़ा जोखिम यह है कि अगर जेडीयू सीमित सीटों पर भी खराब दिखी, तो ‘राष्ट्रीय विस्तार’ का नैरेटिव सीधा झटका खाएगा और निशांत कुमार की पहली आउटसाइड परीक्षा में नकारात्मक नंबर लिखे जाएंगे। इसीलिए पार्टी के लिए सीटों की संख्या जितनी अहम है, उससे ज्यादा अहम सही सीटों का चयन है — वहां जहां उसका सामाजिक आधार वाकई मौजूद हो।
भाजपा की दुविधा: उपयोगी विस्तार या अंदरूनी खतरा?
भाजपा के लिहाज से यह मामला दो धाराओं वाला है। एक धारा यह कहती है कि नीतीश का चेहरा यूपी में पिछड़ी जातियों — खासकर कुर्मी वर्ग — के उस हिस्से को NDA से जोड़ सकता है, जो हाशिए पर जाने का अहसास कर रहा है। 2025 के बिहार में जेडीयू की जीत में महिला मतदाताओं के पक्ष में बड़ा झुकाव दिखा था; यूपी में भी महिला मतदाताओं का अनुपात पुरुषों से ऊंचा है, और बिहार की साइकिल योजना-छात्रवृत्ति-सुशासन की कहानी यहां की महिलाओं के बीच गूंज सकती है। इस नजरिए को मानने वाले रणनीतिकार जेडीयू को गठबंधन का ‘उपयोगी विस्तार’ मानते हैं।
दूसरी धारा चिंता की है। यूपी में भाजपा का वोट बैंक अपने चरम पर है, और घटक दलों की भीतरी खींचतान का फायदा सीधा सपा-कांग्रेस गठबंधन को मिलेगा। भाजपा का सूत्र इसलिए बहुत सावधानी वाला होगा: जेडीयू को इतनी सीटें दो कि वह संतुष्ट रहे, पर इतनी नहीं कि उसकी उम्मीदवारी भाजपा की अपनी सीटों को छू भी न सके। यही संतुलन इस पूरी बातचीत की असली कसौटी होगा — और इसी मेज पर निशांत कुमार की बातचीत की असली परिपक्वता भी परखी जाएगी।
निशांत कुमार के सामने खड़ी पांच कसौटियां
हम मानते हैं कि इस मुहिम में निशांत कुमार की सबसे बड़ी भूमिका है, और इसीलिए उनकी सबसे बड़ी जोखिम भी। उनके सामने पांच कसौटियां खड़ी हैं।
पहली, संगठन की कमी। बिहार में जेडीयू की जड़ें चार दशक गहरी हैं; यूपी में बूथ-स्तर की संरचना अभी प्रतीकात्मक है। नए नियुक्त 396 विधानसभा अध्यक्षों को मतदान के दिन बूथ तक खड़ा कर पाना एक और बात है, कागज पर नाम छापना एक और। समय 2027 से पहले बहुत थोड़ा है।
दूसरी, चेहरों का अभाव। चुनाव अध्यक्षों से नहीं जीते जाते, लोकप्रिय नेताओं से जीते जाते हैं। यूपी में जेडीयू के पास ऐसा कोई आकर्षक स्थानीय नेतृत्व नहीं जो अपने दम पर वोट खींच सके। कल्याण सिंह जैसे वजनदार नाम कभी इस राजनीति से जुड़े थे, पर वे अब इतिहास का हिस्सा हैं।
तीसरी, मेजबान का साया। यूपी में भाजपा के पास सत्ता, संगठन, सांसद-विधायकों की भरमार और आरएसएस का तंत्र है। उसी की छत के नीचे अपनी पहचान बनाना एक पेचीदा कला है — इतना उभरना कि अस्तित्व दिखे, पर इतना नहीं कि मेजबान नाराज हो जाए।
चौथी, विपक्ष की मजबूती। सपा का पूर्वी यूपी का ओबीसी आधार, बसपा का दलित वोट और कांग्रेस के बचे हुए कुछ किले — यह जमीन नए खिलाड़ी के लिए सहज नहीं है।
और पांचवीं, सबसे निर्णायक — निशांत कुमार की अपनी पहचान। बिहार में वे आज भी ‘नीतीश के बेटे’ हैं; यूपी के वोटरों के बीच उनकी अपनी अलग पहचान बनने में महीने नहीं, साल लगेंगे। साथ ही बिहार के स्वास्थ्य मंत्री की जिम्मेदारी और यूपी के चुनावी दौरों के बीच संतुलन का सवाल भी कोई छोटा नहीं है। अगर हरनौत में स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी कार्यवाही पीछे छूटती दिखी, तो उसका असर यूपी में भी सुनाई देगा।
2027 परीक्षा नहीं, नींव है
सियासी बाजार में इस हलचल को लेकर दो किस्से चल रहे हैं। पहला किस्सा कहता है कि यह बीजेपी के सामने मौजूदगी दर्ज कराने की प्रेशर रणनीति है, ताकि सीटों की बातचीत में भारी पड़ा जाए। दूसरा किस्सा इसे लंबी रेस की शुरुआत मानता है, जिसका असली इम्तिहान 2027 में नहीं, उसके बाद के चक्र में होगा। हमारा मत है कि दोनों किस्सों में सच्चाई है, और दोनों का पहला पड़ाव एक ही है — बीजेपी से सीट-बंटवारे की मेज। जेडीयू के पास विकल्प भी कम है: बिहार से बाहर उसका अस्तित्व लगभग नदारद है, और नीतीश की विरासत को राष्ट्रीय स्तर तक ले जाना है तो या तो गठबंधन के भीतर बड़ी भूमिका चाहिए या नए राज्यों में जमीन। अकेले लड़ने का गणित जेडीयू के पक्ष में नहीं है — और NDA के साथ लड़ने की पसंद इसी हकीकत की स्वीकारोक्ति है।





