फर्जी लेबल लगाकर बिका खून(फाइल फोटो)
बिहार के पूर्वी चंपारण जिले से एक ऐसे अपराध का पर्दाफाश हुआ है, जिसने स्वास्थ्य विभाग से लेकर आम मरीजों तक सबको हिला कर रख दिया है। यहां खून का काला कारोबार इतने संगठित तरीके से चल रहा था कि एक यूनिट रक्त में आयरन सिरप और नॉर्मल सलाइन का पानी मिलाकर उसकी मात्रा तीन गुना कर दी जाती थी। इसके बाद मिलावटी रक्त पर किसी रजिस्टर्ड ब्लड बैंक का फर्जी लेबल चिपकाकर उसे हजारों रुपये प्रति यूनिट के भाव से निजी नर्सिंग होमों तक पहुंचा दिया जाता था। बताया जा रहा है कि यह धंधा सिर्फ बेतिया तक सीमित नहीं है — जिले के मुख्यालय मोतिहारी में भी इसी तरह की रक्त आपूर्ति का सूत्र जुड़ा हुआ है।
जाने पूरा घिनौना ‘फॉर्मूला’
औषधि विभाग के औषधि निरीक्षक राकेश कुमार ने स्वीकार किया है कि एक मामला विभाग के संज्ञान में आया है, जिसमें एक यूनिट रक्त में आयरन सिरप और नॉर्मल सलाइन का पानी मिलाकर उसे तीन यूनिट बनाने की बात सामने आई है।
गिरोह का तरीका कुछ यूं था कि जरूरतमंद और आर्थिक रूप से कमजोर युवकों, खासकर नशे के आदी लोगों से 300 से 400 रुपये में रक्त खरीद लिया जाता था। खरीदे गए रक्त की कोई भी अनिवार्य जांच नहीं की जाती थी।
एक यूनिट में आयरन सिरप और नॉर्मल सलाइन डालकर उसकी मात्रा तीन गुना कर दी जाती थी। अब बने तीनों थैलियों पर वैध ब्लड बैंक का नकली लेबल चिपका दिया जाता था। फिर यह मिलावटी रक्त 2,000 से 3,000 रुपये प्रति यूनिट की दर से निजी नर्सिंग होमों को बेच दिया जाता था। यानी लगभग 400 रुपये के रक्त से गिरोह 6,000 से 9,000 रुपये तक कमा लेता था — और इस पूरे दांव पर लग जाती थी किसी अनजान मरीज की जान।
बेतिया में दो लैब ठिकानों पर छापेमारी
जब पटना स्थित स्वास्थ्य विभाग को निजी नर्सिंग होमों में मिलावटी रक्त पहुंचाने की शिकायत मिली, तो विभाग ने औषधि विभाग को सतर्क कर दिया। इसके बाद पुलिस के सहयोग से बेतिया में दो लैब ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की गई। हालांकि, छापेमारी से पहले ही दोनों ठिकानों के संचालक फरार हो गए और अभी तक उनकी गिरफ्तारी नहीं हो सकी है। उनकी तलाश जारी है।
सूत्रों के मुताबिक, ये दोनों संचालक मोतिहारी में भी रक्त की अवैध आपूर्ति करते थे। ऐसे में अब मोतिहारी में भी इसी नेटवर्क के खिलाफ बड़े पैमाने पर छापेमारी की तैयारी चल रही है। अधिकारियों का मानना है कि गिरोह के एजेंट की गिरफ्तारी के बाद ही यह साफ होगा कि रक्त कहां-कहां से जुटाया जाता था और किन-किन नर्सिंग होमों तक यह घिनौना ‘सप्लाई चेन’ फैला हुआ था।
नशे के आदी बनते थे शिकार
इस मामले की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह कोई साधारण स्वार्थी धंधा नहीं, बल्कि एक संगठित गिरोह का रैकेट बताया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि गिरोह के पास ऐसे युवकों और नशे के आदी लोगों की तैयार सूची मौजूद थी, जो बस 300–400 रुपये के लिए रक्त देने को तैयार हो जाते थे। नशे की लत पूरी करने की बेचैनी इतनी गहरी होती है कि कई बार एक ही व्यक्ति महीने में दो-तीन बार रक्त बेच देता है — जबकि चिकित्सकीय नियमों के अनुसार एक वयस्क आमतौर पर तीन महीने के अंतराल पर ही रक्तदान कर सकता है। बार-बार रक्त देने से ऐसे व्यक्तियों का हीमोग्लोबिन स्तर पहले से ही खतरनाक तरीके से कम हो जाता है, जिससे उनका दिया रक्त भी प्रभावी नहीं होता।
डॉक्टरों ने बताया
सदर अस्पताल बेतिया के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. कुमार अमृतांशु ने साफ शब्दों में कहा कि ब्लड की थैली में मिलावट अपने आप में अत्यंत खतरनाक है। उनके अनुसार कि रक्त में आयरन सिरप मिलाने से मरीज के शरीर में गंभीर ट्रांसफ्यूजन रिएक्शन हो सकता है। इससे मरीज को लाभ मिलने के बजाय उसकी जान तक का खतरा पैदा हो जाता है। मरीज की हीमोग्लोबिन स्तर और चिकित्सकीय स्थिति के अनुसार ही उचित, जांचा हुआ रक्त चढ़ाया जाना चाहिए।
डॉ. अमृतांशु ने कहा कि अब तक तो सिर्फ यह सुना जाता था कि नशे के लिए पैसे जुटाने वाले लोग रक्त बेचते हैं, लेकिन एक यूनिट रक्त में आयरन सिरप और सलाइन मिलाकर तीन यूनिट बनाने जैसी घटना ने मरीजों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है।
बिना जांच का रक्त चढ़ाने से किन बीमारियों का खतरा?
चिकित्सा नियमों के अनुसार, रक्त की प्रत्येक यूनिट की ये जांचें करना अनिवार्य है कि एचआईवी (HIV), हेपेटाइटिस-बी (HBsAg), हेपेटाइटिस-सी (HCV), उपदंश / सिफलिस (VDRL), मलेरिया।आरोप है कि अवैध तरीके से जुटाए जा रहे रक्त की इनमें से कोई भी जांच नहीं होती।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के अध्यक्ष डॉ. टीपी सिंह ने चेताया कि मिलावटी या बिना जांच का रक्त चढ़ाने से न सिर्फ रिएक्शन से मरीज की मौत हो सकती है, बल्कि एचआईवी, हेपेटाइटिस-बी, जॉन्डिस और मलेरिया जैसी गंभीर बीमारियों के संक्रमण का खतरा भी टिक जाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि बनावटी रक्त से हीमोग्लोबिन बढ़ाने का अपेक्षित लाभ मिलता ही नहीं, जिससे मरीज की परेशानी बनी रहती है। उन्होंने लोगों से अपील की कि रक्त हमेशा निबंधित (रजिस्टर्ड) ब्लड बैंक से ही लें और बिचौलियों व एजेंटों के जरिए रक्त लेने से बचें।
बिना जांच के रक्त से एचआईवी पीड़ित हुआ मरीज
इस रैकेट की दहशत को तब और गंभीरता मिली जब सदर अस्पताल बेतिया में पिछले दिनों एक मरीज के परामर्श के दौरान पता चला कि उसे किसी निजी नर्सिंग होम में बिना जांच का रक्त चढ़ाया गया था और बाद की जांच में वह एचआईवी संक्रमित पाया गया। कुछ अन्य मरीजों में पीलिया और दूसरे संक्रमणों की शिकायतें भी सामने आई हैं। चिकित्सकों का मानना है कि इन मामलों में बिना जांच के रक्त चढ़ाने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।






