
ऋषी तिवारी
नई दिल्ली। विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, शोध की रुचि और नवाचार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध भास्कराचार्य कॉलेज ऑफ एप्लाइड साइंसेज में राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस (NCSC) के तहत दक्षिण-पश्चिम दिल्ली जिला स्तरीय विज्ञान कांग्रेस आयोजित की गई। कार्यक्रम में विभिन्न विद्यालयों की लगभग 80 बाल विज्ञान टीमों ने हिस्सा लिया। विद्यार्थियों ने अपने प्रोजेक्ट और शोध कार्य प्रस्तुत कर पर्यावरण, समाज और रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी समस्याओं के समाधान खोजने की कोशिश की।
कार्यक्रम का शुभारंभ कॉलेज के प्राचार्य प्रो. अवनीश मित्तल ने किया। इस मौके पर दिल्ली विश्वविद्यालय की राज्य समन्वयक डॉ. अनुपमा यादव भी उपस्थित थीं। स्वागत संबोधन के बाद प्रो. मित्तल ने विद्यार्थियों से संवाद किया और कॉलेज की शैक्षणिक गतिविधियों, उपलब्धियों तथा उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी साझा की। उन्होंने प्रतिभागियों को आसपास की समस्याओं को ध्यान से देखने, उनके कारण समझने और वैज्ञानिक तरीके से समाधान तलाशने के लिए प्रेरित किया।
वैज्ञानिक सोच और शोध को प्रोत्साहन
प्रो. मित्तल ने कहा कि राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस जैसे आयोजन विद्यार्थियों को सवाल पूछने, विचारों को व्यवस्थित करने और अपने निष्कर्षों को दूसरों के सामने प्रस्तुत करने का अवसर देते हैं। उनके अनुसार, ऐसे अनुभव विद्यार्थियों में रचनात्मक लेखन और शोध कार्य के प्रति जागरूकता बढ़ा सकते हैं। कम उम्र से वैज्ञानिक सोच विकसित होने पर विद्यार्थी अपने ज्ञान का उपयोग समाज और देश के हित में कर सकते हैं।
इस विज्ञान कांग्रेस में विद्यार्थियों ने केवल तैयार मॉडल प्रदर्शित नहीं किए, बल्कि अपने प्रोजेक्ट के पीछे की समस्या, अपनाई गई प्रक्रिया और संभावित समाधान भी समझाए। उनके विषयों में पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक चुनौतियां और दैनिक जीवन में सामने आने वाली दिक्कतें शामिल थीं। प्रस्तुतियों ने यह दिखाया कि विद्यार्थी अपने आसपास के अनुभवों को शोध और नवाचार से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
विशेषज्ञों ने दिए सुझाव और मार्गदर्शन
प्रतिभागियों के प्रोजेक्ट्स का मूल्यांकन विशेषज्ञों ने किया। उन्होंने विद्यार्थियों के शोध कार्य, विचार की उपयोगिता और प्रस्तुति का आकलन करने के साथ आवश्यक सुझाव भी दिए। मूल्यांकनकर्ताओं का मार्गदर्शन विद्यार्थियों को अपने काम की खूबियों और सुधार की जरूरत वाले पहलुओं को समझने में मददगार रहा।
कार्यक्रम के दौरान शिक्षकों ने विद्यार्थियों की मेहनत और कल्पनाशीलता की सराहना की। उन्होंने कहा कि इन विद्यार्थियों में भविष्य के वैज्ञानिक बनने की क्षमता है। जिला स्तरीय मंच पर अपने विचार प्रस्तुत करने से बच्चों को आत्मविश्वास बढ़ाने और अलग-अलग विद्यालयों के प्रतिभागियों के काम से सीखने का अवसर मिला।
आयोजन में कॉलेज टीम की अहम भूमिका
कार्यक्रम का समग्र समन्वय डॉ. संयम गुप्ता ने किया। भास्कराचार्य कॉलेज की ओर से प्रो. उमा चौधरी और डॉ. नीरू शर्मा ने कॉलेज समन्वयक के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। उनके सहयोग से कार्यक्रम की व्यवस्थाओं और विभिन्न गतिविधियों का संचालन किया गया। आयोजन में कॉलेज प्रशासन, शिक्षक, जिला समन्वयक और स्वयंसेवक भी शामिल रहे।
डॉ. अनुपमा यादव ने अतिथियों, मूल्यांकनकर्ताओं, शिक्षकों, जिला समन्वयकों, स्वयंसेवकों और सभी विद्यार्थी प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने विशेष रूप से कॉलेज के प्राचार्य प्रो. अवनीश मित्तल, प्रो. उमा चौधरी, डॉ. नीरू शर्मा और कॉलेज प्रशासन को धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि कॉलेज के सहयोग और अच्छी व्यवस्थाओं के कारण आयोजन सुचारु रूप से संपन्न हो सका।
किताबी ज्ञान से आगे सीखने का मंच
डॉ. यादव ने कहा कि राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस का उद्देश्य बच्चों में वैज्ञानिक सोच, अनुसंधान की प्रवृत्ति, रचनात्मकता और समस्या समाधान की क्षमता को विकसित करना है। इस मंच के जरिए विद्यार्थी पाठ्यपुस्तकों में सीखी अवधारणाओं को वास्तविक जीवन की परिस्थितियों से जोड़ सकते हैं। वे किसी समस्या का अध्ययन कर उसके समाधान से जुड़े विचार तैयार करते हैं और उन्हें विशेषज्ञों के सामने रखते हैं।
कार्यक्रम में विद्यार्थियों की उत्साहपूर्ण भागीदारी ने विज्ञान और अनुसंधान के प्रति उनकी रुचि को रेखांकित किया। करीब 80 टीमों की प्रस्तुतियों ने जिला स्तर पर बच्चों को अपने विचार साझा करने और अपने काम पर प्रतिक्रिया पाने का अवसर दिया। आयोजन का समापन प्रतिभागियों और कार्यक्रम को सफल बनाने में योगदान देने वाले सभी सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए हुआ।
भास्कराचार्य कॉलेज में आयोजित यह जिला स्तरीय विज्ञान कांग्रेस विद्यार्थियों को विज्ञान को अपने आसपास की दुनिया से जोड़कर देखने के लिए प्रेरित करने वाला मंच बनी। ऐसे आयोजनों से बच्चों को जिज्ञासा को परियोजना में बदलने, प्रमाणों के आधार पर सोचने और अपने निष्कर्षों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करने का अभ्यास मिलता है—जो आगे की पढ़ाई और शोध के लिए उपयोगी कौशल हैं।





